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प्रसव के बाद डिप्रेशन होना

मेडिकली रिव्यूड

प्रसव के बाद अत्यधिक निराशा अनुभव करना एक तरह का डिप्रेशन होता है, जो अक्सर महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद हो सकती है।

आम तौर पर बच्चे के जन्म के पहले चार से छे हफ्तों के बाद महिलाओं में होने वाली आम समस्या है। हालांकि कुछ मामलों में कई महीनों तक ऐसी कोई निराशा नहीं होती।

प्रसव के बाद की निराशा के कई लक्षण हो सकते हैं जैसे मूड खराब रहना, कुछ भी करने की इच्छा नहीं करना या फिर सिर्फ नींद नहीं आना। हालांकि ज्यादातर महिलाओं को खुद नहीं पता होता कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

स्वभाव में बदलाव महसूस करना, चिड़चिड़ापन या फिर बेचैनी महसूस करना बेहद आम अनुभव हैं। इसे बेबी ब्लूज़ (baby blues) भी कहते हैं। आमतौर पर यह समस्या कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह खत्म हो जाती है। मगर अगर कुछ महिलाओं को ये लक्षण लगातार महसूस होते रहते हैं तो इसे बच्चे के जन्म के बाद का अवसाद माना जाता है।

महिला के पार्ट्नर, परिवार और दोस्तों की ज़िम्मेदारी है कि वे इन लक्षणों को जल्दी से जल्दी पहचान लें और किसी अनुभवी पेशेवर से सलाह करें।

जन्म के बाद अवसाद के लक्षणों के बारे में और ज्यादा जानकारी लेने के लिए पढ़ें।

यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में अवसाद एक बीमारी है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे की देखभाल नहीं करती या उससे प्यार नहीं करती।

प्रसव के बाद अवसाद का इलाज

बच्चे के जन्म के बाद तनाव या निराशा से महिला को अकेलापन, परेशानी या डरने जैसी भावनाएं भी महसूस हो सकती हैं। मगर इस बीमारी के कई तरह के इलाज किए जाते हैं।

ऐसा भी हो सकता है कि जब तक आप इस अवसाद को पहचान कर इसका इलाज शुरू करें तब तक महिला इस अस्थाई परेशानी से मुक्त हो चुकी हो।

अगर आपको या आपके साथी को जन्म के बाद तनाव के लक्षण दिखाई देते हैं तो इसका इलाज जरूरी है।

हो सकता है कि ये बीमारी खुद ही ठीक ना हो सके और इसका असर बच्चे की देखभाल पर भी पड़ना शुरू हो जाए।

बच्चे के जन्म के बाद अवसाद के इलाज में ये शामिल किया जा सकता है।

खुद सलाह लेना

बातचीत से उपचार करना जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी

तनाव दूर करने की दवाइयाँ लेना

प्रसवोत्तर अवसाद के उपचार के बारे में और पढ़ें।

मुझे प्रसव के बाद अवसाद क्यूँ है?

प्रसव के बाद तनाव का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। मगर माना जाता कि इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है। बल्कि कई सारी दिक्कतों के कारण यह अवसाद पैदा होता है। इसके पीछे ये कारण हो सकते हैं:

  • नवजात शिशु की देखभाल से शारीरिक और भावनात्मक तनाव
  • गर्भधारण के फौरन बाद होने वाले शारीरिक और हार्मोनल बदलाव। तुलना की जाए तो कुछ महिलाओं के हार्मोन्स बाकी महिलाओं से ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं
  • निजी दिक्कतें जैसे आर्थिक समस्या, व्यक्तिगत सामाजिक परिस्थितियाँ जैसे पैसे की चिंता, रिश्तेदारों के साथ तनाव या फिर समाज का खराब बर्ताव

महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद अवसाद होने का खतरा और भी ज्यादा बढ़ सकता है अगर:

  • पहले भी अवसाद या मूड में बदलाव जैसी दिक्कतें रही हैं
  • पहले बच्चे के जन्म के समय के बाद भी अवसाद का इतिहास रहा है
  • गर्भावस्था के दौरान तनाव या अवसाद का अनुभव

पढ़ें, बच्चे के जन्म के बाद तनाव के अन्य कारण

कौन प्रभावित है

प्रसव के बाद अवसाद बेहद सामान्य है मगर कुछ लोगों को इस बारे मे पता ही नहीं लगता और इस तरह के मामलों की पहचान ही नहीं होती।

माना जाता है कि हर सात में से एक महिला को बच्चे के जन्म के तीन महीने के अंदर कुछ स्तर के तनाव का अनुभव होता है।

हर तरह के समूह में कम उम्र में मां बनने वाली माताओं में इस तरह के तनाव होने की दर सबसे ज्यादा होती है।

अवसाद

अवसाद या तनाव में आपको हद से ज्यादा मायूसी, उदासी या बेचैनी का अनुभव होता है और काफी लंबे अरसे तक ऐसा ही लगता रहता है।

लक्षण

बच्चे के जन्म के बाद अवसाद कई महिलाओं पर अलग तरह से असर डालता है। ज्यादातर मामलों में जन्म के कुछ ही दिनों या महीनों के बाद इस तरह के लक्षण दिखने लगते हैं और कई महीनों तक बने रहते हैं। मगर कुछ ज्यादा गंभीर मामलों में ये हालात एक साल से भी ज्यादा वक्त तक बने रहते हैं।

प्रमुख लक्षण

  • लगातार उदासी या मूड खराब रहना
  • आस-पास की दुनिया में दिलचस्पी खत्म हो जाना या फिर जो काम पहले अच्छे लगते थे अब उनमें अब दिल नहीं लगना
  • हर वक्त थकान महसूस करना या कमज़ोरी महसूस करना

अन्य लक्षणों में यह भी हो सकते हैं:

  • अनिद्रा, बार-बार नींद टूटना, रात में नींद नहीं आना और दिन भर नींद आते रहना
  • एकाग्र नहीं हो पाना, कोई फैसला नहीं कर पाना
  • आत्मविश्वास कम होना
  • भूख की कमी या भूख बढ़ना (हर वक्त खाते रहना)
  • बहुत जल्दी गुस्सा आना या ज्यादा उदासी महसूस करना (ऐसे मरीजों को परेशान नहीं किया जा सकता)
  • हर वक्त अपनी गलती महसूस करना, ग्लानि अनुभव करना
  • खुदकुशी या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आना

प्रसव के बाद अवसाद आपकी रोज़ाना की जिंदगी में भी दिक्कतें पैदा कर सकता है। कुछ महिलाएं अपने ही बच्चे की देखभाल नहीं कर पातीं। या फिर घर से निकलने और दोस्तों के साथ दोबारा जुड़ने के लिए बेताब हो जाती हैं।

डरावने ख्याल

कुछ महिलाओं के अंदर प्रसव के बाद अवसाद इस हद तक बढ़ जाता है कि वो अपने बच्चे को नुकसान पहुंचाने के बारे में भी सोचने लगती हैं। ये बेहद आम समस्या है। आधी से ज्यादा या लगभग सभी महिलाओं में ये लक्षण दिखाई देते हैं। ये महिलाएं खुद को नुकसान पहुंचाने या फिर फिर आत्महत्या के बारे में भी सोच सकती हैं। मगर इन ख्यालों के आने का ये मतलब हरगिज नहीं है कि आप कोई बुरी मां हैं। ऐसे मामले बेहद कम होते हैं जिनमें महिला सचमुच में ही खुद को या फिर अपने बच्चे को किसी तरह का कोई नुकसान पहुँचाए।

फिर भी ये बेहतर होगा कि आप अपने डॉक्टर को प्रसव के बाद अवसाद के इन लक्षणों के बारे में जानकारी दें। इस इलाज से आप दोनों की सेहत बेहतर होगी और अपने बच्चे का बेहतर विकास कर पाएंगी। साथ ही अपने साथी, परिवार और दोस्तों के साथ आपके संबंध बेहतर बनेंगे।

प्रसव के बाद अवसाद के लिए मदद लेने का ये मतलब नहीं होता कि आप कोई बुरी मां हैं या फिर हालात का सामना नहीं कर पाएंगी।

दूसरों में इस तरह के लक्षणों की पहचान करना

ज्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि वो प्रसव के बाद अवसाद में हैं। वो अपने परिवार या दोस्तों पर अपनी भावनाएं जाहिर भी नहीं करतीं।

ऐसे में महिला के साथी, परिवार के सदस्यों और दोस्तों के लिए ये जरूरी हो जाता है कि वो इन लक्षणों की पहचान जल्दी से जल्दी कर लें। इन संकेतों से खतरा हो सकता है:

  • वे बिना किसी बात के बार-बार रो पड़ती हैं
  • उन्हें अपने बच्चे के साथ सहज होने में दिक्कत हो रही है
  • वो खुद को लेकर उदासीन होती जा रही हैं, उदाहरण के तौर पर अपने कपड़े नहीं धोना या बदलना
  • कई बार वो वक्त को लेकर संवेदना खो चुकी होती हैं, मसलन दस मिनट या दो घंटे गुजरने में उन्हें फर्क महसूस नहीं होता
  • वो मनोरंजन की सभी संज्ञाएं खो देती हैं और किसी भी मजाकिया बात पर हंसना बंद कर देती हैं
  • बार-बार समझाने पर भी उन्हें बार-बार लगता है कि उनके बच्चे के साथ कुछ बुरा हो रहा है

अगर आपको किसी में प्रसव के बाद अवसाद दिखाई देता है तो उन्हें खुद से, डॉक्टर से, सेहत सलाहकार से खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित करें। प्रसव के बाद अवसाद का सही इलाज होना बेहद जरूरी है।

प्रसव के बाद मनोविकृति

प्रसव के बाद बहुत ही कम मामलों में कुछ महिलाओं में मनोविकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये ज्यादा गंभीर होते हैं। माना जाता है कि एक हजार महिलाओं में से एक महिला में इस तरह की दिक्कत हो सकती है।

प्रसव के बाद मनोविकार के लक्षणों में शामिल हैं:

  • दो तरह के लक्षण एक साथ दिखाई देना, जैसे एक पल में खुश रहना फिर दूसरे ही पहल बहुत उदास हो जाना
  • उन बातों पर यकीन करने लगना जो जाहिर तौर पर झूठी हैं या फिर भ्रामक या अतार्किक हैं, आम तौर पर ये बच्चे के बारे में ही होता है जैसे ये सोचना कि बच्चा मर रहा है या फिर उनके बच्चे के पास जादूई शक्तियां हैं
  • अनजानी आवाजें सुनना या देखना या मतिभ्रम का शिकार होना, आमतौर पर बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाली आवाजें सुनाई देना

प्रसव के बाद मनोविकार को आपातकालीन स्थिति माना जाता है। अगर आपको अपने आसपास किसी महिला में इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो बिना वक्त गंवाएं अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

अगर आपको लगता है कि ऐसे मरीज़ से आपको, आपके साथी या आपके बच्चे को खतरा हो सकता है तो फौरन अपने स्थानीय आपातकालीन विभाग में फोन करके ड्यूटी पर मौजूद मनोचिकित्सक से बात करें।

प्रसव के बाद ओसीडी(OCD)

कुछ महिलाएँ बच्चे के जन्म के बाद ओब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर का शिकार हो जाती हैं। ओसीडी से पीड़ित मरीज़ अनचाहे (ज्यादातर मामलों में गलत) ख्यालों, तस्वीरों या हरकतों को महसूस करने लगते हैं। ऐसे मरीज किसी भी आदत या बर्ताव को लेकर सनक की हद तक बर्ताव करने लगते हैं। अपने बर्ताव से बेखबर ऐसे मरीजों के व्यवहार में किसी आदत को लेकर दोहराव दिखाई देने लगता है।

ओसीडी का इलाज व्यवहार थैरेपी या दवाइयों से किया जा सकता है।

कारण

अभी तक प्रसव के बाद अवसाद के किसी खास कारण का पता नहीं लगाया जा सका है। ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि इस अवसाद के पीछे कई कारणों का मिला-जुला असर हो सकता है।

इसमें ये भी शामिल हो सकते हैं:

गर्भावस्था के दौरान अवसाद

  • मुश्किल प्रसव
  • घर पर सहयोग की कमी
  • रिश्तों की समस्याएँ
  • आर्थिक समस्याएं
  • आपके पास किसी नज़दीकी रिश्तेदार या परिजन या दोस्त का नहीं होना
  • प्रसव के बाद शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें जैसे यूरिन पर नियंत्रण कम हो जाना, एपिसीओटॉमी(episiotomy scar ) के निशान या फिर फ़ोरसेप डेलिवेरी

अगर आपने इनमें से किसी भी समस्या का सामना नहीं किया और आपका प्रसव बिलकुल सीधा-सादा रहा हो, फिर भी बच्चे का जन्म पूरा जीवन बदलने वाला तनावपूर्ण अनुभव हो सकता है जिससे से अवसाद हो सकता है।

लोग अक्सर मानते हैं कि एक रात में बच्चे की देखभाल करना सीख जाएंगे। मगर आम तौर पर नए-नए अभिभावक बनने वाले लोगों को इस दबाव का सामना करने में कई बार महीनों का वक्त लग जाता है। ये उनके लिए भी उतना ही बड़ा सच होता है जिनके पास पहले से ही बच्चे होते हैं।

अलबत्ता कुछ बच्चे दूसरे बच्चों के मुकाबले ज्यादा परेशान करने वाले होते हैं। उन्हें संभालना आसान नहीं होता। इन हालात से तनाव और थकावट की हालत बन जाती है।

जोखिम किसे है

प्रसव के बाद अवसाद का जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं:

  • परिवार में अवसाद या प्रसव के बाद अवसाद का इतिहास। अनुवांशिकी भी इन दोनों लक्षणों के पीछे कारण होती है, मगर कैसे, अभी तक ये स्पष्ट नहीं हो सका है।
  • पूर्व में भी अवसाद या प्रसव के बाद अवसाद का इतिहास होना। या फिर मूड में बार-बार बदलाव होना या फिर बाईपोलर डिसऑर्डर।

हार्मोन्स के बदलाव की भूमिका

एक जमाने में प्रसव के बाद अवसाद के पीछे हार्मोन्स में बदलाव को ही एक मात्र वजह माना जाता था। अभी भी अवसाद के पीछे हार्मोन्स में बदलाव की बड़ी भूमिका मानी जाती है। मगर इसे अब इकलौता कारण नहीं माना जाता।

एक अन्य थ्योरी के मुताबिक कुछ महिलाएं प्रसव के बाद हार्मोन्स के गिरते स्तर को लेकर ज्यादा संवेदनशील होती हैं। सभी माएं हार्मोन्स में बदलाव को महसूस करती हैं मगर कुछ ही माएं इस बदलाव से संवेदनशील तौर पर जुड़ती हैं।

ये भी संभव है कि इसके अलावा बच्चे की देखभाल का तनाव या फिर आर्थिक दिक्कतों की वजह से अवसाद के हालात बन जाते हैं।

अवसाद तब होता है जब आप हद से ज्यादा उदासी, निराशा या फिर बेचैनी को महसूस करती हैं।

आप पेशाब करने में अनियमितता, गैस या मल विजसर्जन में अनियमितता का अनुभव करती हैं यानी मूत्राशय या आंत्र को नियंत्रित नहीं कर सकती हैं।

रोग की पहचान

आपके डॉक्टर को सिर्फ एक या दो सवाल पूछ कर ही इस रोग की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए:

  • क्या पिछले महीने आप निराशा के कारण परेशान रहीं, आपने अवसाद या नाउम्मीदी को महसूस किया?
  • क्या पिछले महीने आपको इस बात ने भी परेशान किया कि जो छोटी चीजें करते वक्त आपको आम तौर पर खुशी महसूस होती थी अब उनसे आपको कोई खुशी नहीं मिलती है?

अगर इनमें से किसी भी सवाल का जवाब हां में है तो मुमकिन है कि आप प्रसव के बाद अवसाद में हैं। अगर दोनों सवालों का जवाब हां है तो आपके प्रसव के बाद अवसाद में होने की संभावना है।

आपके जवाब के आधार पर ये भी पूछा जा सकता है कि क्या आपको मदद चाहिए या क्या आपको मदद की जरूरत महसूस होती है।

कुछ मांएं खासतौर पर जो अपने साथी या रिश्तेदार के बिना ही अपने बच्चे की देखभाल कर रही हैं। इन सवालों का जवाब ईमानदारी से देने कतरा सकती हैं क्योंकि उन्हें चिंता होती है कि अगर उनके प्रसव के बाद अवसाद के रोग की पहचान जाहिर हो गई तो उन्हें एक बुरी मां माना जाएगा। ऐसे हालात में उन्हें बच्चे की देखभाल के लिए उनसे दूर ले जाया जाएगा।

इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि एक मां से बच्चे को बेहद गंभीर मामलों में ही बच्चे को देखभाल के लिए उनसे दूर ले जाया जाएगा। प्रसव के बाद अवसाद के इलाज का मुख्य उद्देश्य बच्चे और मां के बीच के रिश्ते को सुधारना और मजबूत करने में मदद करना ही होता है।

अगर आपके प्रसव के बाद अवसाद के लक्षण बहुत गंभीर हो चुके हैं तो भी आपको मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज की जरूरत है। इसके लिए खासतौर पर मां और बच्चों के लिए क्लीनिक उपलब्ध हैं।

अन्य परीक्षण

कभी कभी डॉक्टर ये सुनिश्चित करने के लिए आपका ब्लड टेस्ट भी कर सकते हैं, कि आपमें थकान या मूड खराब होने का कोई शारीरिक कारण नहीं है। जैसे की थायरॉयड या फिर एनिमिया (शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी, जिससे थकान का अनुभव होता है) बच्चे के प्रसव के बाद ऐसे हालात भी अक्सर पैदा हो सकते हैं।

कभी-कभी डॉक्टर या स्वास्थ्य सलाहकार आपको एक प्रश्नावली पूरी करने के लिए भी दे सकते हैं जैसे कि एडिनबर्ग पोस्टनेटल डिप्रेशन स्केल(ईपीडीएस)। इससे आपकी स्थिति खासकर प्रसव के बाद अवसाद का आकलन करने में मदद मिलती है। साथ ही इस प्रश्नावली से ट्रीटमेंट के बाद आपकी प्रगति को भी आसानी से पहचाना जा सकता है।

प्रसव के बाद अवसाद की गंभीरता का आकलन

यदि आपके डॉक्टर को प्रसव के बाद अवसाद का संदेह है, तो वे आपके लक्षणों को जानना चाहेंगे ताकि वे यह आकलन कर सकें कि इसकी गंभीरता कितनी तीव्र है।

वो मालूम करना चाहेंगे कि क्या आपको:

  • नींद में कोई व्यवधान तो नहीं होता
  • एकाग्र होने या निर्णय लेने में कोई समस्या है
  • आत्मविश्वास काम हो रहा हो
  • भूख नहीं लग रही या फिर भूख ज़्यादा हो (हर वक्त खाते रहना अवसाद का एक लक्षण होता है)
  • बेचैनी महसूस हो रही हो
  • कोई भी शारीरिक गतिविधि करने में थकान या अनिच्छा अनुभव हो रहा हो
  • ख़ुद को दोष देने का विचार आ रहा हो
  • आत्महत्या के विचारों का अनुभव हो

इन सवालों का जवाब देते समय ईमानदारी जरूरी है। सटीक जानकारी देने से ही डॉक्टर आपका सही उपचार कर सकेंगे।

अगर आपको इनमें से तीन लक्षण हैं तो आपको हल्का-फुल्का अवसाद घेर चुका है।

अगर आप में पांच या छह लक्षण हैं तो आप मध्यम स्तर का अवसाद है। मध्यम स्तर के अवसाद से पीड़ित लोगों के लिए सामान्य गतिविधियाँ करना बेहद कठिन होता है।

अवसाद के लक्षणों कि कुल संख्या से ही तय होगा डॉक्टर ये तय सकेंगे कि आपका अवसाद हल्का है, मध्यम स्तर का है या फिर गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है।

अगर आप में ये सभी लक्षण हैं तो आपको गंभीर अवसाद की दिक्कत है। गंभीर स्तर के अवसाद का सामना कर रहे लोग कोई भी काम करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाते हैं। इन लोगों को हर वक्त मानसिक स्वास्थ्य देखभाल करने वाले लोगों की सहायता की जरूरत होती है।

ब्लड टेस्ट के दौरान नस में से रक्त का एक नमूना लिया जाता है। इसकी जांच प्रयोगशाला में की जाती है।

अवसाद में उदासी और निराशा हद से ज्यादा बढ़ जाती है और ये हालात लंबे अरसे तक बनी रह सकती है।

थायराइड एक संयुक्त टुकड़ा या कार्टिलेज है जो वोकल कॉर्ड्स को बंद करता है।

इलाज

अगर आपको लगता है कि आपको प्रसव के बाद अवसाद की शिकायत है तो आपको अपने डॉक्टर या फिर स्वास्थ्य सलाहकार से जल्दी से जल्द बात करनी चाहिए।

आपको और आपके परिवार के लिये ये याद रखना जरूरी है कि आपको इस स्थिति से पूरी तरह ठीक होने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

आपके प्रसव के बाद अवसाद में मदद करने के लिए सामान्य इलाज यहां बताया गया है।

सहयोग और सलाह

प्रसव के बाद अवसाद को ठीक करने के लिए सबसे पहला और अहम कदम इस बीमारी के लक्षणों की पहचान करना है। आपके साथी, परिवार और दोस्तों की का साथ और समझदारी इस बीमारी से लड़ने में आपके ठीक होने में सबसे बड़ी भूमिका अदा करती है।

बहरहाल, इससे लाभ लेने के लिए सबसे पहले आपको अपने नज़दीकी लोगों से बात करके उन्हें समझाना होगा कि आपको कैसा महसूस हो रहा है। सभी कुछ अपने अंदर भरते चले जाने से तनाव बढ़ता चला जाता है। खासतौर पर आपके साथी के लिए जो खुद को बंद महसूस कर सकता है।

किसी समाज सेवी या सलाहकार से सहयोग और सलाह लेने से भी मदद मिल सकती है। स्वयंसेवी समूह भी इस बीमारी से लड़ने में बेहतर सलाह और सहयोग देकर प्रसव के बाद के अवसाद के प्रभावों से लड़ने में मददगार हो सकते हैं। आप ही के जैसे लक्षणों से घिरी हुई किसी अन्य महिला से मिलकर और उनसे बात करके आप बेहतर महसूस कर सकती हैं।

अपने स्वास्थ्य कर्मी से अपने क्षेत्र में सेवाओं के बारे में पूछें।

व्यायाम

अवसाद से लड़ने के लिए व्यायाम को बेहद अहम माना गया है। अगर आपको हल्का अवसाद है तो ये आपके लिए मुख्य इलाज भी हो सकता है।

मनोवैज्ञानिक उपचार

जिन महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतों का कोई पिछला इतिहास नहीं होता उनके लिए मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों को आमतौर पर इलाज के लिए सबसे पहले सुझाया जाता है।

कुछ सामान्य चर्चाएं नीचे दी गई हैं:

स्वयं सहायता का मार्गदर्शन

स्वयं सहायता इस सिद्धान्त पर आधारित होती हैं कि डॉक्टर आपकी मदद से आपकी मदद कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर आपका डॉक्टर आपको स्वयं सहायता का मेन्यूअल और इसके विभिन्न प्रकार के लक्षण और इनसे कैसे निबटना है, इससे मदद करने के लिए जानकारियाँ आपको उपलब्ध करवा सकता है। मरीज़ के अवसाद के कारण असहाय महसूस करने पर उनके पास व्यवहार करने की ज्ञानवर्धक तकनीकें भी उपलब्ध होती हैं।

थेरेपी लेना

थेरेपी के जरिए आपको अपनी समस्याओं के बारे में परामर्शदाता से या फिर समूह के साथ बात करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

इससे आप ज्यादा सकारात्मक तरीके से अपनी समस्या पर विचार कर सकते हैं।

प्रसव के बाद अवसाद को दूर करने के लिए दो सबसे ज्यादा प्रचलित पद्धति हैं:

  • कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी
  • पारस्परिक चिकित्सा पद्धति

कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी

कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी(सीबीटी) में ये माना जाता है कि बिना किसी सहायता के अवास्तविक सोच नकारात्मक व्यवहार की ओर ले जाती है।

सीबीटी का उद्देश्य इस चक्र को तोड़ना है। सोचने के नए तरीके विकसित करना है जो आपको ज्यादा सकारात्मक तरीके से व्यवहार करने में मदद कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर आदर्श माता का व्यवहार के बारे में सोचना किसी तरह की सहायता नहीं कर सकता साथ ही अवास्तविक भी है। सभी मांएं इंसान होती हैं और इंसान गलती करता है। लिहाजा सुपर मां बनने की सोच ना ही मददगार होगी और ना ही वास्तविक होगी।

आम तौर पर सीबीटी को चार से छह सप्ताह के सेशन में उपलब्ध कराया जाता है।

इंटरपर्सनल पद्धति

इंटरपर्सनल पद्धति(आईपीटी) में ये पहचान की जाती है कि दूसरों के साथ आपका व्यवहार अवसाद की भावनाओं में योगदान कर रहा है।

अमूमन आईपीटी चार से छह सप्ताह के सेशन में दिया जाता है।

एंटीडिप्रेसन्ट

इस पद्धति का इस्तेमाल का सुझाव दिया जाता है अगर:

  • आपको प्रसव के बाद हल्का-फुल्का अवसाद है और अवसाद का आपका पिछला इतिहास भी रहा है
  • आपका अवसाद गंभीर रूप ले चुका है
  • आपको सीबीटी काउंसलिंग से कोई मदद नहीं मिली है या फिर आप पहले दवाइयाँ लेती हैं
  • बात कर इलाज करने की पद्धति और एंडीडिप्रेसन्ट पद्धति के मिले जुले प्रयोग की सलाह दी गई है

एंटीप्रेसन्ट आपके दिमाग में मूड को निर्धारित करने वाले रसायनों का संतुलन बनाकर काम करता है। इस पद्धति में दवाइयों के जरिए मूड खराब होने या चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, अनिद्रा सरीखे लक्षणों को कम करते हैं। इससे आपको सामान्य बर्ताव करने में मदद मिलती है और आप अपने नवजात शिशु का बेहतर तरीके से सामना कर सकती हैं।

लोकप्रिय धारणा के उलट एंटीडिप्रेसेंट्स की दवाइयों की लत नहीं लगती है। आमतौर पर इन दवाइयों का कोर्स 6 से नौ महीने में खत्म हो जाता है।

एंटीडिप्रेसेंट्स दो से चार हफ्तों में काम करना शुरू कर देते हैं। लिहाजा अगर आपको अपनी स्थिति में कोई सुधार नहीं लगता, फिर भी ये बहुत जरूरी है कि आप इस पद्धति को लेते रहें। ये भी बहुत जरूरी है कि आप दवाइयों को डॉक्टर की सलाह के आधार पर पूरी अवधि तक लेते रहें। अगर आप ने काफी पहले ही इन्हें लेना बंद कर दिया तो अवसाद के लौट आने की काफी संभावना रहती है।

प्रसव के बाद मध्यम से लेकर गंभीर स्तर के अवसाद से पीड़ित 50 से 70 फीसदी महिलाओं को आराम हो जाता है। फिर भी एंटीडिप्रेसेन्ट सभी के लिए असरदार नहीं होते हैं।

एंटीडिप्रेसेन्ट और बच्चे को दूध पिलाना

जो महिलाएं अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं उनके लिए कुछ खास सेरोटोनिन रीपटेक इनहिबिटर (एसएसआरआई,SSRI) की सलाह दी जाती है।

परीक्षणों से पता चला है कि स्तन के दूध में पाए जाने एंटीडिप्रेसेन्ट की मात्रा इतनी कम होती है कि किसी तरह की हानि नहीं होती।

एसएसआरआई(SSRIs) के दुष्प्रभाव

  • बीमार या कमज़ोरी महसूस करना
  • दृष्टि का धुंधला हो जाना
  • दस्त या कब्ज
  • चक्कर आना
  • अस्थिर या उग्र महसूस करना
  • अनिद्रा(ठीक से नींद नहीं आना या बहुत ज्यादा नींद आना

जैसे ही आपके शरीर को इन दवाइयों की आदत हो जाती है तो दवाइयों के ये दुष्परिणाम भी दूर हो जाते हैं। जब आप एंटीडिप्रेसेंट ले रही हों तो अपने डॉक्टर से बच्चे को दूध पिलाने के विकल्पों के बारे में बात करें।

कई महिलाएं ये मानती हैं कि बच्चे को दूध पिलाने से उनके और बच्चे के बीच में प्रगाढ़ संबंध बन जाता है। इससे उनके मातृत्व को मज़बूती मिलती है और उनका आत्मविश्वास भी मजबूत होता है। प्रसव के बाद अवसाद के लक्षणों से लड़ने के लिए ये तथ्य अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रसव के बाद गंभीर अवसाद का इलाज

रेफेरल

अगर आपका प्रसव के बाद का अवसाद गंभीर रूप ले चुका है या फिर आप पर इलाज को कोई असर नहीं हो रहा है तो आपको मानसिक स्वास्थ्य टीम के पास भेजा जा सकता है। आम तौर पर इस टीम में मानसिक रोग विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक और विशेषज्ञ नर्स भी होती हैं। ये टीम बातचीत के जरिए उपचार करती है।

अगर ये महसूस किया जाता है कि आपका प्रसव के बाद का अवसाद इतना बढ़ गया है कि आप खुद को या फिर अपने बच्चे को नुकसान पहुंचा सकती हैं तो आपको कुछ दिनों के लिए मानसिक स्वास्थ्य क्लीनिक में भर्ती किया जा सकता है। अगर आपका साथी और परिवार आपके लिए सहयोगी रवैया रखते हैं तो आपके ठीक होकर लौटने तक वो आपके बच्चे का ख्याल रख सकते हैं।

यदि आपके पास अपने बच्चे की देखभाल करने के लिए कोई मदद उपलब्ध नहीं है या आपकी मानसिक स्वास्थ्य टीम को लगता है कि आपके बच्चे को आपसे अलग करना आपके स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव डालेगा, तो आपको मां और बच्चे के लिए खास तौर पर तैयार किए गए मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक में रखा जा सकता है, जब तक आप अपने बच्चे की देखभाल के लायक नहीं हो जातीं।

आपके बच्चे को आपसे दूर सुलाया जाएगा। जैसे ही आपके लक्षण इस इलाज से सही होते दिखाई देंगे आपके बच्चे को आपके कमरे में सुला दिया जाएगा।

दवाइयाँ

कुछ महिलाओं में मनोविकृति के लक्षण दिखाई देने लगते हैं जिसमें मरीज़ सच्चाई और कल्पना के बीच में फर्क करने में असमर्थ हो जाता है।

यदि आपके साथ ऐसा होता है, तो आपका इलाज निम्नलिखित संयोजन के साथ किया जा सकता है:

  • लिथियम या एक मिरगी-रोधी दवा जैसी मूड- नियंत्रित करने वाली दवाएँ
  • एंटीसाइकोटिक(यह मनोविकृति के लक्षणों से निपटने में मदद करता है)
  • एक ट्रैंक्विलाइज़र, जैसे कि बेंजोडायजेपाइन आपको आराम दिलाता है।

इस प्रकार की दवाएँ लेते समय आप स्तनपान नहीं करा सकती हैं, इसलिए आपको बच्चे को बोतल से दूध पिलाना होगा।

बिजली के झटकों से इलाज या इलेक्ट्रोकोनवल्सिव थेरेपी (ईसीटी)

यदि आपको प्रसव के बाद गंभीर रूप से अवसाद हो गया है तो इलेक्ट्रोकोनवल्सिव थेरेपी(ईसीटी) का सुझाव दिया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग केवल तब किया जाता है जब एंटीडिप्रेसेंट और अन्य उपचार से लाभ नहीं होता है।

यदि ईसीटी का सुझाव दिया जाता है, तो आपको बेहोश करने के बाद आपकी मांसपेशियों को सुन्न कर दिया जाएगा। आपके सिर में इलेक्ट्रोड लगाने के बाद मस्तिष्क में से बिजली की तरंगें पास की जाती हैं। ज्यादातर लोगों का इलाज ईसीटी के छह से 12 सत्र में किया जाता है। सामान्य रूप से सप्ताह में दो सत्र दिए जाते हैं।

ज्यादातर लोगों के लिए ईसीटी सबसे प्रभावशाली तकनीक होती है और सभी तरह के अवसाद को दूर कर देती है। मगर इस तकनीक के बाद लक्षणों को काबू में रखने के लिए एंटीडिप्रेसेंट्स लेने जरूरी होते हैं। अभी तक ये पता नहीं है कि ईसीटी किस तरह काम करती है। मगर माना जाता है कि दिमाग के अंदर बिजली की तरंगें दिमाग रासायनिक संयोजन को बदल कर मूड को सुधार देती हैं।

कुछ लोगों को ईसीटी तकनीक के बाद सिरदर्द और अल्पकालिक से लेकर दीर्घ कालिक याद्दाश्त खोने के बुरे अनुभव भी होते हैं। याद्दाश्त खोने के डर के चलते हर एक सत्र के बाद आपकी याद्दाश्त का मूल्यांकन किया जाता है।

अगर ऐसा लगता है कि आपकी याद्दाश्त पर असर पड़ रहा है या फिर आप पर प्रतिकूल दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं तो आपको ईसीटी सत्र को रोक दिया जाएगा। फिर भी ज्यादातर मरीज़ ईसीटी के सत्र को आसानी से सहन कर लेते हैं।

अवसाद के इलाज के लिए एंटीडिप्रेसेंट दवाईयां का इस्तेमाल किया जाता है मसलन फ्लूओक्सेटाईन या पैराक्सिटाइन(fluoxetine, paroxetine)।

कुछ होने होगा या नहीं होने जैसी दिक़्क़तों के बारे में जब आप चिंतित, असहज या व्यथित महसूस करती हैं तो बेचैनी का बेहद परेशान करने वाला अनुभव होता है।

दिमाग विचारों, याद्दाश्त और भावनाओं को नियंत्रित रखता है। ये शरीर को गति, संवेदना और हलचल महसूस का संदेश देता है।

काउंसलिंग के तहत किसी प्रशिक्षित व्यक्ति के निर्देशन में आपसे चर्चा की जाती है जिससे आपको अपनी समस्याओं के जवाब खुद तलाशने का मौका मिलता है।

जब आप काफी लंबे अरसे तक हद से ज्यादा अवसाद, निराशा या बेचैनी महसूस करते हैं तो इसे अवसाद कहते हैं।

खुराक किसी भी दवाई की किसी एक वक्त में ली जाने वाली तयशुदा मात्रा होती है जैसे दवाई की कोई नपी तुली मात्रा।

सच्ची घटनाएं

जब 42 साल की लूसी का साक्षात्कार किया गया तो उसके दो बच्चे थे, 15 साल का जेमी और दस साल का ऐलिस। लूसी को जेमी के जन्म के बाद प्रसव के बाद अवसाद के लक्षण सामने आने शुरू हो गए थे।

जब मेरे पास जेमी आया था तो ये काफी मुश्किल प्रसव था, मगर दिक्कतों के बावजूद मैने पूरे वक्त बेहद रोमांच महसूस किया। मुझे मां बनकर बहुत खुशी मिली और मैने हर एक पल का आनंद उठाया।

मगर ऐलिस के जन्म के वक्त ये कुछ अलग था। हालांकि वो मेरी आंखों का तारा थी, प्यारी और सुंदर बच्ची थी। फिर भी मै उसके जन्म और उसके बाद के पहले सालों को याद नहीं करना चाहती। मुझे ऐसा महसूस होता था इसे मै दोबारा याद नहीं करना चाहती। जब मै मुड़कर पीछे देखती हूं तो मुझे लगता है कि उस शुरुआती साल मुझसे छिन गए।

मेरी बीमारी मेरी गर्भावस्था के काफी बाद शुरू हुई। मै लगभग 34 साल की थी और मुझे अनिद्रा की शिकायत रहने लगी। मुझे लगा कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मेरी बच्ची मेरे मूत्राशय पर दबाव डाल रही थी और मुझे बार-बार शौचालय जाना पड़ता था। फिर भी मुझे काफी अजीब लगा, काफी अलग जैसे मेरे इर्द-गिर्द जो हो रहा था मैं उसमें शामिल ही नहीं थी।

मेरी नियमित डॉक्टर उस समय कहीं दूर थी, लिहाजा मै एक नए डॉक्टर के पास गई। मगर उसे कुछ भी समझ नहीं आया। उसने मुझे कुछ टैमेज़पन और अच्छी नींद के लिए एक पेज पर कुछ टिप्स लिखकर दिए। मगर टैमेज़पन या इन टिप्स से कोई असर नहीं हुआ। मैं सो नहीं पाई।

मेरे पति और मेरी मां दोनों को पता था कि कुछ गलत हो रहा है। मेरी मां बताती हैं कि मैं अपने आप में चली गई थी। जैसे वहां जो हो रहा था उसमें मैं थी ही नहीं, मगर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं बस जीना नहीं चाहती थी। मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं किसी बुलबुले में थी जहां से मैं हर किसी को देख सकती थी मगर कोई मुझे नहीं देख सकता था। मुझे पता था कि मेरे साथ कुछ बहुत बुरा हो रहा था, मगर मुझे नहीं पता था कि क्या गलत हो रहा था।

जब मैं 37 हफ्तों की गर्भवती थी तो मैं अपने नियमित डॉक्टर के पास गई। वो कमाल की थी। उसने पहचान लिया कि मुझे अवसाद है और मुझे कुछ हल्की मात्रा वाली एंटीडिप्रेसेंट्स दी। हालांकि कुछ लोग इन हालात में दवाइयाँ देने के खिलाफ होते हैं, मगर मुझे उन दवाइयों से मेरी जिंदगी वापस मिल गई। हालांकि उन दवाइयों को काम करने में तीन हफ्तों का वक्त लगा, मगर वो दवाईयां मुझे दोबारा वर्तमान में ले आई। इससे मैं बेहतर नहीं हुई मगर इन दवाइयों ने मुझे अवसाद के सबसे खराब हालत से निकाल लिया।

इस सारे वक्त मैं सामान्य जीवन की गति से गुजर रही थी। जब मेरी बच्ची पैदा हुई तब जेमी पांच साल का था। मैं उसकी और छोटी बच्ची की देखभाल कर रही थी। मैं एक स्वचालित पायलट मोड की तरह काम कर रही थी। मैंने वो सब किया मगर इस सब में कोई भी दिलचस्पी या फिर मनोरंजन नहीं रह गया था। मुझे पता था कि मेरे पास एक बेहद प्यारी खूबसूरत बच्ची थी, मगर मैं उसका आनंद नहीं ले पा रही थी।

मेरे डॉक्टर ने मेरे अवसाद को दूर करने की दवाइयों की मात्रा बढ़ा दी थी, मगर मेरे ऊपर क्या गुजर रही थी वो बस मैं ही जानती थी। इस समय मैं उन ख्यालों के बारे में बात भी नहीं कर सकती जो उन दिनों मुझ पर हावी हो गए थे। मगर वो बहुत ही डरावने विचार थे। बाद में मुझे प्रसव के बाद महिलाओं की बीमारियों इन डरावने खयालों के बारे में पता चला। मुझे लगा जैसे मैं पागल हो जाएंगी। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी। मैं अवसाद में चली गई थी। मुझे आंसुओं भरे दर्द के झटके महसूस होते थे।

प्रसव के बाद की बीमारियाँ और उनके लक्षण हर किसी में अलग होते हैं और मेरा मुख्य लक्षण बेचैनी था। मुझे हर बात से दिक्कत होने लगी थी और मैं इस चक्र को तोड़ नहीं पा रही थी। जब ऐलिस लगभग 5 महीने की हो गई तो मैंने एक मनोचिकित्सक से मिलना शुरू कर दिया। उसने मुझे ये समझाने में मदद की कि मैं इतनी परेशान क्यों थी। इसी दौरान मैंने एक काउंसलर से भी बात करनी शुरू कर दी। इनकी मदद से मैं धीमी रफ्तार से ठीक होने लगी।

मुझे वापस पहले जैसा महसूस होने में दो से तीन साल का वक्त लगा। कभी अच्छा दौर आया तो कभी बुरा दौर भी आया। एक वक्त तो मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं वापस पीछे जा रही हूं। अब सब कुछ आसान लगने लगा था और कभी ये मुझे वापस पीछे धकेल देता था। कुछ महिलाएं बहुत थोड़े वक्त में बिलकुल ठीक हो जाती हैं, मगर ये बीमारी हर किसी के लिए अलग होती है।

मैं कुछ मायनों में भाग्यशाली थी। मेरे पास एक बेहतरीन डॉक्टर था जिसे मेरे प्रसव के बाद अवसाद के बारे में सबकुछ पता था। उसने इन लक्षणों को काफी जल्दी पहचान लिया। मैं इस मामले में भी भाग्यशाली थी कि मैंने एक प्रतिभाशाली काउंसलर को खोज लिया था। मेरे साथ सब अच्छा हुआ और सात सालों से मैं वापस खुद की जिंदगी में लौट आई हूं।

मुझे नहीं पता कि अगर मुझे एक बच्चा और होता है तो मेरे साथ दोबारा से यही सब होगा। मुझे पता है कि मेरे साथ दोबारा वैसा ही होने की संभावनाएं ज्यादा हैं। ये डराने वाली हैं। मगर ये समझना अहम है कि ये एक गंभीर बीमारी है। आप बेहतर हो जाते हैं। मदद मिलती है मगर इसमें वक्त लगता है। फिर भी अंधेरी सुरंग के उस पार रौशनी है।

रोकथाम

किसी भी प्रसव के बाद अवसाद के हालात से बचने के लिए अपने डॉक्टर को अपने पिछले अवसाद या गर्भावस्था के दौरान बेचैनी या खराब हालात के बारे में जानकारी दें।

अगर आप एक और बच्चे के बारे में विचार कर रहे हैं और आपको पिछले बच्चे के प्रसव के बाद अवसाद की समस्या झेलनी पड़ी थी तो अपने डॉक्टर से इस विषय में सलाह मशवरा कर सकते हैं।

नवजात शिशु के पैदा होने के बाद अपने डॉक्टर को पूरे मामले से अवगत करा दें और सुनिश्चित करें कि उसे प्रसव के बाद अवसाद की संभावना के बारे में पूरी जानकारी है। इन सावधानियों के लेने से अवसाद के लक्षणों को पहचानने में आसानी हो जाती है। साथ ही मरीज़ को समस्या के शुरू होते ही इलाज मिलने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि किसी महिला में प्रसव के बाद अवसाद के जोखिम के बारे में सही-सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

किसी महिला में प्रसव के बाद अवसाद होने के पीछे कई तथ्य हो सकते हैं जो निम्नलिखित हैं:

  • पिछला मेडिकल इतिहास
  • निजी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां
  • वर्तमान रिश्ते
  • प्रसव के दौरान जटिलताएँ

यदि आपको प्रसव के बाद अवसाद होने का जोखिम बेहद ज्यादा है, फिर भी इसे टाला जा सकता है। अपने डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की सहायता से प्रसव के बाद होने वाले अवसाद के जोखिम को कम किया जा सकता है।

निम्नलिखित भी सहायक सिद्ध हो सकते हैं:

  • ज्यादा से ज्यादा आराम और विश्राम करना
  • नियमित हल्का-फुल्का व्यायाम करना
  • ज्यादा देर तक बिना खाना खाए ना रहें क्योंकि ब्लड शुगर का स्तर कम होने से आप बेहद खराब अनुभव महसूस कर सकती हैं
  • बहुत ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन ना करें क्योंकि ज्यादा पीने से भी आप खराब अनुभव कर सकती हैं
  • संतुलित और स्वस्थ आहार लें
  • एक ही बार में सब कुछ करने की कोशिश ना करें, अपने लक्ष्यों की एक सूची तैयार करें
  • अपनी चिंताओं के बारे में अपने साथी, क़रीबी दोस्त और परिजनों से बात करें
  • सहायता और सहयोग के लिए निजी सहायक समूह या राष्ट्रीय हेल्पलाईन से संपर्क करें
  • सुपर मॉम बनने की कोशिश ना करें, प्रसव के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद एक साल तक अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करने की कोशिश ना करें, ज्यादातर लोगों के लिए एक नवजात शिशु खुद में ही एक चुनौती होता है
  • निराशा से बचें, प्रसव के बाद अवसाद किसी को भी प्रभावित कर सकता है, इसमें आपका कोई दोष नहीं है

रोकथाम के उपचार

यदि आपको प्रसव के बाद अवसाद का जोखिम काफी ज्यादा है तो आपका डॉक्टर या डॉक्टर इन्चार्ज प्रसव के फौरन बाद एहतियात के तौर पर आपकी देखभाल के लिए एंटीडीप्रेसेन्ट का सुझाव दे सकता है।

इसी तरह यदि आपको द्विध्रुवीय समस्या या मनोविकृति का इतिहास है तो आपको जल्दी ही लीथियम लेने का सुझाव दिया जा सकता है। लीथियम मूड को स्थिर करने में प्रभावशाली होता है। आम तौर पर ये मनोविकृति को रोकने में मददगार साबित होता है।

रक्त के जरिए ऑक्सीजन शरीर में प्रवाहित होता है और कार्बन डाईऑक्साइड को बाहर करता है। इसे दिल के जरिए पूरे शरीर में पंप किया जाता है। हद से ज्यादा उदासी, निराशा या बेचैनी जब काफी लंबे अरसे तक बनी रहती है तो इसे अवसाद कहते हैं।

सामग्री का स्त्रोतNHS लोगोnhs.uk
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